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चुनाव / राजनीतिराष्ट्रीय समाचार

सहारनपुर मंडल में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर ही जीत का पूरा दारोमदार

By Devang Rohila
June 1, 2026 4 Min Read
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सहारनपुर, 1 जून। सियासी लिहाज से सहारनपुर मंडल की डेमोग्राफी जातीय नेताओं के अनुकूल नहीं होने से भाजपा में जीत का पूरा दारोमदार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर ही निर्भर करता है। बार बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहारनपुर मंडल के दौरे कर रहे हैं। कहीं न कहीं इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनावों में पार्टी की जीत को सुनिश्चित करना भी बड़ा मकसद है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज बिजनौर में चुनावी सभा को संबोधित करने के बाद तीसरे पहर सहारनपुर के मां शाकुम्बरी देवी स्थल का निरीक्षण करेंगे। जहां तीन दिन पहले आई आपदा से बाढ़ में दो महिलाओं की मौत हो गई थी और सैकड़ों दुकानें और वाहन आदि बह गए थे।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मां शाकुम्बरी देवी में भूरा महादेव से लेकर मां शाकुम्बरी देवी मंदिर तक ऊंचा और बड़ा गलियारा बनवा रहे हैं जिससे श्रद्धालु देवी मंदिर तक बिना किसी बाधा के दर्शनों के लिए जा सकें। मुख्यमंत्री का सहारनपुर जनपद का यह तीसरा-चौथा हालिया दौरा है।
पूर्व आईपीएस एवं पूर्व कुलपति डा. अशोक कुमार राघव कहते हैं कि उन्होंने सहारनपुर मंडल की डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) के अध्ययन में यह पाया है कि सहारनपुर मंडल में किसी भी एक स्थान पर किसी एक विशेष जाति का बाहुल्य नहीं है। हर जाति के छोटे-छोटे पाकेट्स हैं। इससे इस मंडल में सियासी रूप से किसी भी व्यक्ति के लिए जातीय नेता बनने का अवसर मौजूद नहीं है।
सहारनपुर मंडल के हर विधानसभा क्षेत्र में मिश्रित आबादी है। इसलिए चुनाव में वही व्यक्ति जीत सकता है जिसे विभिन्न जातीयों का सामूहिक रूप से समर्थन प्राप्त हो। ये स्थिति भाजपा के लिए मुश्किलें पैदा करने वाली है। सहारनपुर, शामली और मुजफ्फरनगर तीनों जनपदों में मुस्लिम मतदाता बहुतायत में हैं। दूसरा स्थान दलित मतदाताओं का है। कोई भी जातीय गठबंधन मुसलमानों के साथ मिलकर चुनाव जीतने की गारंटी है।
भाजपा की जीत के लिए हिंदू मतदाताओं के बीच ध्रुर्वीकरण जीत की अनिवार्य शर्त है। भाजपा नेतृत्व के लिए जातीय संतुलन एवं समन्वय बनाए रखना भी आवश्यक है। 2024 के लोकसभा चुनाव में राजपूतों की छोटी सी नाराजगी भाजपा पर भारी पड़ी थी। जिससे भाजपा तीनों सीटों पर पराजित हो गई थी। सहारनपुर में कांग्रेस के इमरान मसूद, कैराना में सपा की इकरा हसन और मुजफ्फरनगर सीट पर सपा के हरेंद्र मलिक आराम से चुनाव जीत गए थे।
सहारनपुर जनपद में भाजपा में उसके दो विधायक कीरत सिंह और मुकेश चौधरी गुर्जर हैं। सहारनपुर सीट पर पंजाबी समाज के राजीव गुंबर हैं और देवबंद सीट पर राजपूत बिरादरी के बृजेश सिंह हैं। रामपुर मनिहारान में अनुसूचित जाति के देवेंद्र निम हैं। मुस्लिम बहुल बेहट जिसमें मां शाकुम्बरी क्षेत्र भी शामिल हैं से सपा के उमरअली खान विधायक हैं। सहारनपुर देहात से सपा के आशु मलिक विधायक हैं। सहारनपुर मंडल में भाजपा के पास अपना खुद का कोई दलित मजबूत नेता नहीं है। मुजफ्फरनगर की पुरकाजी सुरक्षित सीट का प्रतिनिधित्व रालोद के दलित नेता अनिल कुमार करते हैं। सहारनपुर में दलितों पर प्रभाव रखने वाले बसपा से आए दो नेता रविंद्र कुमार मोल्लू रामपुर क्षेत्र और जगपाल सिंह सहारनपुर देहात भाजपा में हैं।
पूरे सहारनपुर जनपद में भाजपा के पास ना कोई राजपूत नेता है, ना ही गुर्जर नेता है अलबत्ता बसपा से आए सैनी बिरादरी के डा. धर्म सिंह सैनी जरूर सहारनपुर जनपद में सैनियों पर अपना प्रभाव रखते हैं। इसी तरह पूरे मंडल में भाजपा के पास ना तो कोई जाटों का, ना ही बनियों का बड़ा नेता है।
2024 में सपा से आए सहारनपुर के तीन बार के विधायक संजय गर्ग का बनियों पर अच्छा खास प्रभाव माना जाता है। मुजफ्फरनगर के राज्यमंत्री कपिलदेव अग्रवाल वैश्य बिरादरी के जरूर हैं लेकिन अपनी बिरादरी के नेता नहीं माने जाते हैं। सहारनपुर मंडल में आने वाले चुनाव में भाजपा की डगर मुश्किलों भरी रहने वाली है। थाना भवन के पूर्व विधायक ठाकुर सुरेश राणा को जरूर राजपूतों में वो सम्मान हासिल है जो किसी अन्य राजपूत नेता को नहीं है। सहारनपुर मंडल में भाजपा के अकेले राजपूत विधायक देवबंद के बृजेश सिंह हैं जिनका अपना कोई निजी जनाधार नहीं है।
सहारनपुर जनपद में कभी ठाकुर फूल सिंह, अजीत प्रसाद जैन और चौधरी यशपाल गुर्जर का विशेष प्रभाव और दबदबा माना जाता था। मुजफ्फरनगर जनपद की जो डेमोग्राफी है उसके चलते ही 1971 में चौधरी चरण सिंह और 2019 में चौधरी अजीत सिंह साधारण लोगों से चुनाव हार गए थे। मुजफ्फरनगर जनपद में भाजपा के पास पांच में से केवल एक सीट मुजफ्फरनगर ही है। शामली जिले में पिछली बार उसका खाता नहीं खुला था। हालांकि सहारनपुर में भाजपा के पास चार विधायक हैं। लेकिन लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा सात में से केवल देवबंद सीट पर ही बढ़त हासिल कर पाई थी। उसका कारण भी बसपा उम्मीदवार द्वारा अच्छी खासी तादाद में मुस्लिम वोटों में बंटवारा करना रहा था। जाहिर है आने वाले विधानसभा चुनाव बहुत ही चुनौतीपूर्ण होंगे।

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